नहीं बिके जो क़लम…









ग्रीष्म ॠतु की शुभ कामनाएं ! देते हुए कवि मित्र श्री राजेंद्र स्वर्णकार  ने मुझे लिखा- “… हालांकि आपके ब्लॉग पर तो यह मौसम काफ़ी वक़्त पहले ही आ चुका है । मौसम के अनुरूप एक काव्य रचना है । बिना संशोधन / बिना संपादन  ऐंटीवायरस पर  स्थान दें । वैसे तो रचानाओं के लिए अलग ब्लॉग है किंतु इसे यहां समाचार-संवाद में कवि के अनुरोध पर अविकल प्रस्तुत किया जा रहा है। 

नहीं  करेगी  क्षमा क़लम की  सौ - सौ  पुश्तें भी उनको !
कुत्सितजन  के चरण  धोक कर  नाम  ज़ियारत  देते  जो !
वृहद् विशद् दायित्व ; क़लम! मत भय कर, मत कर तू विश्राम, 
चलती  चल  अविरामस्वयं  के  रक्त में अपनी  देह  डुबो !
 
यहां  अनधिकृत  अधिकारी बनहड़पें   पर - अधिकारों को !
महिमामंडित  किया  जा  रहा मंच - मंच   मक्कारों  को !
पड़े हुए हैं  यहां उपेक्षित,   भव्य - दिव्य   मंदिर  -  प्रांगण ;
अर्ध्य - तिलक - सम्मान  अंध  दुर्गंध  भरे  गलियारों   को !
 
छ द् मी -  छली  सियाही  का  भी  अर्थ  उजाला  कहते हैं !
गुंथे  संपोलों  नाग  बिच्छुओं  को   मणि  माला  कहते  हैं !
घोर  स्वार्थवश  महापाप  करते   कब  हिचके  निर्लज   ये ?
गुजरे  -  गये  अधम गंगा  को  गंदा  नाला   कहते   हैं !  
 
लार  टपकते  जम  बैठे  ये हर  चौके   हर  थाली   पर !
नहीं  जड़ों  में  मिलते  ये पर  मिलते  डाली - डाली  पर !
पावन  स्वेद  की  दो  बूंदें  भी  नहीं  इन्होंने  अर्पित   की ;
हक़  जतलाते  मिलते  ये सामंत  बने   हरियाली     पर !
 
ढीठ  स्वघोषित  शिखरपुरुष ;   गलियों  -  बाज़ारों    गुर्राते !
मटमैले   मैले   मन  वाले ,   दर्पण  को   भी    झुठलाते !
क्षुधा -  एषणा -  लिप्सा - पीड़ित दनुज  मनुज से बन बैठे ,
लज्जा  होती  तनिक  ;    डूबचुल्लू  पानी  में  मर  जाते !
 
आत्म  -  प्रशंसक  दंभी  रहते   ताड़  वृक्ष  ज्यों  तने  तने !
घृणित  घिनौनों  पतितों के  मन - मस्तक  विष्टा - कीच सने !
सड़ांध -  सागर  इनके  भीतर  का  देखो ,   घिन  हो   जाए,
जग  को  भरमाते  फिरते  ये  भ्रष्ट -  अशिष्ट ;   विशिष्ट बने !
 
ठोस  स्वर्ण  प्रतिमाएं  पस्त -  पराजित  खोखल  पुतलों  से ! 
गुणी  गहन  गंभीर प्रताड़ित  होते  पग - पग   छिछलों से !
श्रेष्ठ  सृजन   कुम्हला' -  मुर्झाए   पूर्वाग्रह -   झंझाओं    में ,
हंस  पिट  रहे  यत्र  तत्र ,    अधिनायकवादी   बगुलों    से !
 
लामबंद  लंपट  लुच्चे   ठग   कपटी  कुटिल   कमीने  घाघ !
जुगलबंदियां   नागों -  कागों   की ;   गूंजित  वीभत्सी   राग !
झूम  रहे  हैं   गिद्ध -  भेड़िये गलबहियां   डाले -      डाले ,
बजे  दुंदुभी  दुराग्रहों  की ;   चाटुकार   मिल'   खेलें   फाग !
 
नहीं  बिके  जो  क़लम ;   दोमुंहों -   दुष्टों   को   धिक्कारेगी !
सदा  सनातन   शिवम्  सुंदरम्  सत्यम्    वह    उच्चारेगी !
जीवित निर्भय सत्य ; …  जान कर युग होगा आश्वस्त् - प्रसन्न,
एक पांत  प्रतिक्रिया  में  विष  भी   उगलेगी  -   फुत्कारेगी  !
क़लम    लेकिन  कभी -  किसी  से  कहीं  हार  स्वीकारेगी !!!
 - राजेन्द्र स्वर्णकार 
 
गिराणी सोनारों का मोहल्ला ,
बीकानेर  ३३४००१ राजस्थान 
mob - 9314682626
phon - 0151 2203369 
Email :-swarnkarrajendra@gmail.com 

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लेखक, कवि अर राजस्थानी रा हेताळू

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